रजिस्टर्ड हक त्याग विलेख के बिना नहीं हटेगा वारिसों का नाम
जबलपुर। पैतृक संपत्ति में बेटियों के अधिकार को लेकर कानून अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है। Hindu Succession (Amendment) Act, 2005 तथा सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Vineeta Sharma v. Rakesh Sharma के बाद बेटियों को भी बेटों के समान पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि यदि पुत्री 9 सितंबर 2005 को जीवित थी, तो उसे पैतृक संपत्ति में समान अधिकार मिलेगा, भले ही पिता की मृत्यु संशोधन से पहले ही क्यों न हो गई हो।
क्या है हक त्याग विलेख?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार Relinquishment Deed (हक त्याग विलेख) एक ऐसा वैधानिक दस्तावेज है, जिसके माध्यम से किसी संपत्ति का सह-स्वामी या वैध उत्तराधिकारी अपने हिस्से का अधिकार दूसरे सह-स्वामी के पक्ष में छोड़ता है।
विशेष बात यह है कि यह अधिकार केवल सह-स्वामी के पक्ष में ही छोड़ा जा सकता है, किसी बाहरी व्यक्ति के पक्ष में नहीं।
कब बनता है हक त्याग विलेख?
जब किसी व्यक्ति की मृत्यु बिना वसीयत (Intestate) के हो जाती है और उसके उत्तराधिकारी आपसी सहमति से अपनी हिस्सेदारी किसी एक उत्तराधिकारी को देना चाहते हैं, तब हक त्याग विलेख बनाया जाता है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पैतृक संपत्ति विवादों को समाप्त करने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक माना जाता है।
पंजीयन अनिवार्य, बिना रजिस्ट्रेशन दस्तावेज अमान्य
Registration Act, 1908 की धारा 17(1)(b) के अनुसार अचल संपत्ति से जुड़े अधिकारों के हस्तांतरण के लिए दस्तावेज का पंजीयन अनिवार्य है।
वहीं धारा 49 के तहत अपंजीकृत हक त्याग विलेख को न्यायालय में साक्ष्य के रूप में मान्यता नहीं दी जाएगी।
केवल शपथपत्र से नहीं छोड़ा जा सकता अधिकार
विशेषज्ञों के अनुसार कई मामलों में लोग केवल शपथपत्र या सहमति पत्र देकर पैतृक संपत्ति में अपना अधिकार छोड़ने का प्रयास करते हैं, लेकिन कानूनन यह मान्य नहीं है।
पैतृक संपत्ति में हिस्सा छोड़ने के लिए रजिस्टर्ड हक त्याग विलेख आवश्यक माना गया है।
नामांतरण से पहले जरूरी होगा रजिस्टर्ड दस्तावेज
राजस्व रिकॉर्ड में नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर भी स्पष्ट निर्देश हैं।
यदि कोई उत्तराधिकारी फौती या वारिसाना नामांतरण से पहले अपना अधिकार छोड़ना चाहता है, तो उसे रजिस्टर्ड हक त्याग विलेख प्रस्तुत करना होगा।
राजस्व अधिकारी बिना रजिस्टर्ड दस्तावेज के किसी वर्ग-1 वारिस का नाम नहीं हटा सकते। ऐसा करने पर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई भी संभव है।
मध्य प्रदेश में कम लगता है स्टाम्प शुल्क
मध्य प्रदेश में हक त्याग विलेख पर संपत्ति मूल्य का लगभग 0.5 प्रतिशत स्टाम्प शुल्क देय होता है।
उदाहरण के तौर पर ₹1 लाख की संपत्ति पर लगभग ₹500 स्टाम्प शुल्क देना पड़ता है, जबकि दानपत्र (Gift Deed) पर लगभग 5 प्रतिशत तक स्टाम्प शुल्क देय होता है।
किन परिस्थितियों में निरस्त हो सकता है हक त्याग विलेख?
सामान्यतः रजिस्टर्ड हक त्याग विलेख अपरिवर्तनीय माना जाता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इसे चुनौती दी जा सकती है—
दबाव या अनुचित प्रभाव में दस्तावेज कराया गया हो
धोखाधड़ी हुई हो
दस्तावेज में वास्तविक आशय का गलत उल्लेख किया गया हो
ऐसे मामलों में सक्षम सिविल न्यायालय में वाद दायर किया जा सकता है।
तीन वर्ष के भीतर दी जा सकती है चुनौती
कानूनी प्रावधानों के अनुसार हक त्याग विलेख के निष्पादन से तीन वर्ष के भीतर ही उसे चुनौती दी जा सकती है। इसके बाद सामान्यतः निरस्तीकरण स्वीकार नहीं किया जाता।
हक त्याग विलेख और दानपत्र में बड़ा अंतर
विशेषज्ञ बताते हैं कि हक त्याग विलेख केवल सह-स्वामियों के बीच किया जा सकता है, जबकि दानपत्र किसी भी व्यक्ति के पक्ष में किया जा सकता है।
इसके अलावा दानपत्र पर स्टाम्प शुल्क अधिक होता है, जबकि हक त्याग विलेख अपेक्षाकृत कम खर्चीला विकल्प माना जाता है।
कानूनी विशेषज्ञ की राय
Gopal Singh Baghel ने बताया कि पैतृक संपत्ति से जुड़े विवादों से बचने के लिए सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि केवल मौखिक सहमति या शपथपत्र के आधार पर अधिकार त्याग मान्य नहीं होगा, इसके लिए विधिवत पंजीकृत दस्तावेज आवश्यक है।
गोपाल सिंह बघेल,
एडवोकेट, एम. पी. हाई कोर्ट
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