नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से होने वाले तलाक (म्यूचुअल डिवोर्स) के मामलों में एक अहम और सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि मध्यस्थता के जरिए हुए समझौते के बाद कोई पक्ष आखिरी समय पर पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने इस पर स्पष्ट “लक्ष्मण रेखा” खींचते हुए कहा कि ऐसा करना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है
📌 क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक दंपत्ति के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा था।
दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से विवाद खत्म करने के लिए मध्यस्थता (मेडिएशन) का रास्ता अपनाया
मध्यस्थता के दौरान दोनों के बीच समझौता हुआ और कुछ शर्तों पर सहमति बनी
समझौते की शर्तों का आंशिक रूप से पालन भी किया गया
इसके बाद:
अगस्त 2024 में तलाक की प्रक्रिया के तहत “पहला प्रस्ताव (First Motion)” पूरा कर लिया गया
लेकिन जब “दूसरा प्रस्ताव (Second Motion)” दाखिल करने का समय आया, तब पत्नी समझौते से पीछे हट गई
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इस रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा—
एक बार समझौता कर लेने और उस पर अमल शुरू हो जाने के बाद पीछे हटना कानून की भावना के खिलाफ है
इससे न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है
ऐसे मामलों में अदालत हस्तक्षेप कर सकती है और उचित आदेश दे सकती है
कोर्ट ने क्या संकेत दिए?
म्यूचुअल डिवोर्स में दोनों पक्षों की सहमति जरूरी है, लेकिन
अगर समझौते का पालन शुरू हो चुका है, तो आखिरी समय पर पीछे हटना स्वीकार्य नहीं
इससे अनावश्यक देरी और उत्पीड़न बढ़ता है
🧾 क्यों अहम है यह फैसला?
तलाक के मामलों में “समझौता तोड़ने” की प्रवृत्ति पर लगेगी रोक
मध्यस्थता प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ेगी
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का इस्तेमाल रणनीति या दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता


